उत्तराखण्ड राज्य के सृजन के पश्चात कार्य संस्कृति में उल्लेखनीय सुधार आया जिससे विभिन्न चालू योजनाओं के क्रियान्वयन के सम्बन्ध में अत्यन्त उत्साह के साथ कार्यवाही सम्पादित की गई। परिणाम स्वरूप कई अभिनव कार्य किये गये जिसमें से कुछ निम्न प्रकार वर्णित हैं-

   ईको-टूरिज्म एवं पर्यावरण आधारित पर्यटनः-पर्यटन को बढ़ावा देने में स्थानीय नागरिकों की सहभागिता तथा जैव विविधता संरक्षण ईको-टूरिज्म का उद्देश्य है।X;kjgohaपंचवर्षीय योजना  में 6000.00 लाख रु0  का इस योजना में प्रLrkfor  किया गया है। पर्यटन विभाग के माध्यम से  विभाग में पर्यटन सम्बन्धी 19 परियोजना/ स्थलों पर कार्य किया गया हैं। वर्ष 2007-08 में कुल 231375 भारतीय पर्यटक तथा 16463 विदेशी पर्यटक पार्को  एवं वन्यजीव विहारों के भ्रमण पर आए जिससे विभाग को कुल रु0 341.95 लाख रु0   का राजस्व  प्राप्त हुआ।  

   ईको-टूरिज्म हेतु राज्य सरकार द्वारा स्वीकृत योजनाः- पर्यटन को बढ़ावा देने में स्थानीय नागरिकों की सहभागिता तथा जैव विविधता संरक्षण इको-टूरिज्म का उद्देश्य है। ईको-टूरिज्म कार्यक्रम की महत्वपूर्ण उपलब्धियां निम्न प्रकार रहीं :-

रामनगर के पास चूनाखान के पास ईको-टूरिज्म सेंटर की स्थापना सन- 2003 में की गई। जोशीमठ में भी इसी प्रकार के ईको-टूरिज्म सेंटर की स्थापना की गई है। उत्तरकाशी वन प्रभाग में मांझी व रैथल में दो कैम्पिंग साइट का विकास किया गया जो प्रदेश में अपने प्रकार का पहला प्रयास है। इसके अतिरिक्त छोटी हल्द्वानी में कार्बेट हैरिटेज टैरल, सीताबनी में बाल्मिकि आश्रम  टैरल व ईको-टूरिज्म केन्द्र के लिए बाराती रौनेचर टैरल का विकास किया गया। ईको-टूरिज्म केन्द्र में प्रशिक्षणार्थी प्रतिभागियों के ठहरने के लिए पांच कमरों का छात्रावास, शौचालय व एक स्नान कक्ष का निर्माण किया गया। रैणी में गौरा देवी संग्राहलय का निर्माण व तोलमा नेचर  टैरल में पुल का निर्माण किया गया। इसके अतिरिक्त अंगोड़ा, गंगी व क्यारी गॉंव में शोध कार्य का सम्पादन हुआ। विभिन्न ब्रोशर व पुस्तिकाओं का प्रकाशन कार्य किया गया है ।  समुदायों को सहायक अनुदान तथा इन्टरप्रिटेशन सेन्टर का विकास(सोनानदी) किया गया है।

  बाँस तथा रिंगालः-

* Bamboo & Fiber Development Board की स्थापना वर्ष 2003 में की गयी है, जिसमें मुख्य वन संरक्षक स्तर के एक अधिकारी को मुख्य कार्यकारी अधिकारी के तौर पर नियुक्त किया गया है।

* बांस उगाने हेतु स्थानीय जनता के लिए अनेक प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन किया गया।

* वन क्षेत्रों से बाहर उगाए गये बांस के कटान एवं अभिवहन के लिए नियमों में शिथिलता प्रदान करते हुए इन्हें अभिवहन नियमावली की परिधि से बाहर किया गया है ताकि निजी भूमि पर बांस उगाने वालों को कठिनाइयों का सामना न करना पड़े।

* सर रतन टाटा ट्रस्ट द्वारा वित्त पोषित प्रोजेक्ट के माध्यम से वन विभाग उत्तराखण्ड द्वारा हरिद्वार-नजीबाबाद मार्ग पर पीली स्थान पर एक बांस रिंगाल की हाई टैक नर्सरी की स्थापना की गई है। इस नर्सरी की क्षमता 2 लाख पौध प्रति वर्ष होगी। इसके अतिरिक्त एक अस्थाई नर्सरी बड़कोट रेंज के माजरी स्थान पर भी स्थापित की गई है, जहाँ पर लगभग 30 हजार बांस की पौध उगाई जा रही है।

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