भारत रत्न पण्डित गोविन्द बल्लभ उच्च स्थलीय प्राणी उद्यानः- पर्वतीय क्षेत्र में पाये जाने वाले विभिन्न प्रकार के महत्वपूर्ण वन्य जीवों एवं पक्षियों के बारे में जानकारी उपलब्ध कराने और जन साधारण के हृदय में वन्य जीवों के प्रति प्रेम भावना जागृत करने तथा उनके संरक्षण एवं विकास के बारे में जागृति लाने के उद्देश्य से नैनीताल में वर्ष 1980 में एक उच्च स्थलीय प्राणी उद्यान की स्थापना का निर्णय लिया गया। इसका नाम भारत रत्न पण्डित गोविन्द बल्लभ पन्त उच्च स्थलीय प्राणी उद्यान रखा गया। इसका क्षेत्रफल 4.70 हैक्टेयर है। इस प्राणी उद्यान का शुभारम्भ 1 जून 1995 को हुआ। दिनांक 15 जून 2001 पत्र संख्या 2173/वै0स0/''जू'' द्वारा उक्त प्राणी उद्यान के प्रबन्ध हेतु एक सोसाईटी की स्थापना की गयी है।

  सीबक थौर्न ( Hippophae spp. ) :- उत्तराखण्ड  के शीतोष्ण कटिबन्ध हिमालय क्षेत्र में समुद्र तल से 2000 मीटर से 4500 मीटर तक की ऊंचाई पर नदियों तथा झरनों के आस-पास यह पौधा पाया जाता है। जल एवं मृदा संरक्षण हेतु अत्यन्त उपयोगी होने के साथ-साथ यह जानवरों को पौष्टिक चारा प्रदान करता है। इसके फल, पत्तियां तथा तने से विभिन्न प्रकार की बीमारियों (चर्मरोग, ट्यूमर, दमा रोग, आंख का उपचार) के इलाज हेतु दवा बनायी जाती है। इसके फल एक पौष्टिक भोजन हैं तथा इसमें विटामिन ’ए’ के तत्व पाये जाते हैं। फलों का उपयोग जैम बनाने तथा पौष्टिक पेय बनाने में होता है। सीबक थौर्न की उपयोगिता एवं मांग को ध्यान में रखकर उत्तराखण्ड  में वन विभाग द्वारा अलकनंदा भूमि संरक्षण वन प्रभाग, गोपेश्वर में वर्ष 2003 में कृषकों को निजी भूमि पर सीबक थौर्न लगाने की जानकारी उपलब्ध कराने व उन्नत पौध उपलब्ध कराने तथा वन पंचायत के माध्यम से अधिक से अधिक उपयुक्त क्षेत्र में इस प्रजाति को लगाकर क्षेत्र में वृद्धि करने के उद्देश्य से "सैन्टर आफ एक्सलैंस" की स्थापना की गयी।

  थुनेर (Taxus baccata):- थुनेर (Taxus baccata) मध्य हिमालय पर्वत श्रंखला में समुद्र तल के 1800 मीटर से 3000 मीटर तक पाया जाता है। यह एक महत्वपूर्ण औषधीय वृक्ष है। इसकी पत्तियों से प्राप्त कैंसररोधी टैक्साल नामक रसायन से कैंसररोधी दवा का निर्माण किया जाता है। इस प्रजाति में प्राकृतिक पुनरोत्पादन अत्यन्त कम होने तथा औषधि हेतु अत्यन्त उपयोगी होने के कारण वन विभाग द्वारा कायिक प्रवर्धन; (Vegetative propagation) विधि द्वारा पौध उगाकर वन क्षेत्र तथा वन पंचायतों के माध्यम से रोपण कार्य कराया जा रहा है। पिथौरागढ़ वन प्रभाग में एक तथा सिविल एवं सोयम वन प्रभाग, अल्मोड़ा में थुनेर पौध उगाने हेतु दो पौधशाला की स्थापना भी की जा रही है।

 च्यूरा (Diploknema butyracea):- च्यूरा (Diploknema butyracea) का वृक्ष उच्च हिमालयन क्षेत्र तथा बाह्‌य हिमालय में कुमांऊ से पूर्व की ओर सिक्किम तथा भूटान तक 1500 मीटर ऊंचाई तक पाया जाता है। कुमांऊ मण्डल में मुख्यतः पिथौरागढ़ जनपद के काली, सरयू पूर्वी रामगंगा तथा गोरी नदी की घाटियों में प्राकृतिक रूप से पाया जाता है। गढ़वाल मण्डल में इस प्रजाति की उपस्थिति नगण्य है।  च्यूरा को पहाड़ का कल्पवृक्ष कहा जाता है। यह एक बहुउपयोगी वृक्ष है जिसके बीजों की गिरी से वसा प्राप्त होती है। इसके अतिरिक्त यह ईंधन, दवा, इमारती लकड़ी, जानवरों के चारे तथा शहद प्राप्ति का उत्तम स्रोत है। नेपाल में इस वृक्ष से प्राप्त वसा को "चिवरी घी" कहा जाता है।

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