नये अन्वेषण :-
   
1. लैन्टाना उन्मूलन हेतु नवीन तकनीक का प्रयोग - पर्वतीय एवं मैदानी क्षेत्रों में महत्वपूर्ण प्रजातियों के पुनर्जनन में बाधक मुख्य झाड़ी प्रजाति लैन्टाना(Lantana camara) के उन्मूलन हेतु नवीनतम तकनीक का प्रयोग कर इसके उन्मूलन सम्बन्धी अनुसंधान कार्य कराये गये। इसके उन्मूलन हेतु पूर्व में प्रचलित विधियों के स्थान पर दिल्ली विश्वविद्यालय के डा0 श्री सी0आर0 बाबू द्वारा प्रतिपादित नवीनतम तकनीक कट रुट  स्टाक विधि का प्रयोग किया गया। इस विधि में लैन्टाना की समस्त झाड़ी को एक ओर से दबाते  हुए झाड़ी को भूमि सतह से 3-4  से0मी0 नीचे जड़ एवं तने के मिलान बिन्दु के नीचे से काटा जाता है। काटे गये हिस्से को पूरी झाड़ी सहित उठाकर जमीन के ऊपर उल्टा करके रख दिया जाता है। जिससे कि इसका कल्ला देने वाला भाग जल्दी से जल्दी सूख जाये तथा इसकी नये कल्ले उत्पन्न करने की शक्ति समाप्त हो जाये। सूखी हुई झाड़ियों को अलग-अलग जगह एकत्र कर जला दिया जाता है। भूमि के अन्दर शेष रहा जड़ का भाग स्वत: ही सूख जाता है।
          लैन्टाना के उन्मूलन के पश्चात क्षेत्र में विभिन्न स्थानीय वृक्ष झाड़ी एवं जड़ी-बूटी प्रजातियों का पुनर्जनन आना प्रारम्भ हो जाता है। इससे क्षेत्र  की जैव विविधता पर पड़ने वाले प्रभाग का अध्ययन करने हेतु लैन्टाना उन्मूलन कराये गये क्षेत्रों का पुनर्जनन एवं जैव विविधिता सर्वेक्षण कार्य कराया जा रहा है। इस कार्य को  प्रभाग के अन्तर्गत विभिन्न अनुसंधान राजियों जैसे रानीखेत गाजा, लोहाघाट, कालसी, गोपेश्वर में लगभग 300 है0 क्षेत्र में सफ़लतापूर्वक कराया गया। 

  2. चीड़ पिरुल के चैक डाम निर्माण कार्य एवं इसके प्रभावों का अध्ययन - वनाग्नि दुर्घटनाओं को रोकने तथा पर्वतीय क्षेत्रों में भूमि एवं जल संरक्षण हेतु प्रभाग के अन्तर्गत विभिन्न स्थानों पर चीड़ की सूखी पत्तियों(पिरुल) के चैक डाम बनाये गये। इनका अत्यन्त उत्साहजनक परिणाम प्राप्त हुए है। इनके बीच में पानी के साथ बहकर आयी मिट्टी भर जाने के कारण यें अत्यन्त ठोस व मजबूत हो गये है। साथ ही इनके पीछे की ओर पानी रुक जाता है जो कि धीरे-धीरे रिसकर भूमि के अन्दर चला जाता है जिससें कि क्षेत्र के भूजल स्तर में वृद्धि होती है तथा नालों में जल रिचार्ज बढ़ जाता है। पानी के साथ बहकर आये बीज व समीपस्थ स्थित वृक्षों से गिरने वाले बीज के जमने से इन क्षेत्रों में अनेक महत्वपूर्ण प्रजातियों का प्राकृतिक पुनर्जनन आना प्रारम्भ हो गया है। इसके अभिलेखीय प्रमाण के लिए इन क्षेत्रों को पुनर्जनन सर्वेक्षण व जैव विविधिता सर्वेक्षण कराया जा रहा है।
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