3. एयर लेयरिंग, ग्राफ़्टिंग, बडिंग सम्बन्धी अनुसंधान कार्य- पर्वतीय क्षेत्र की महत्वपूर्ण प्रजातियों जैसे काफ़ल, बुराँश आदि से शीघ्र उत्पाद प्राप्त करने हेतु एयर लेयरिंग के माध्यम से इनका Vegetative Propagation करने सम्बन्धी अनुसंधान कार्य कराये गये। यह कार्य अनुसंधान राजि रानीखेत की द्वारसों पौधशाला में कराये गये। इनके अत्यन्त उत्साहजनक परिणाम प्राप्त हुए है। एयर लेयरिंग के माध्यम से विकसित काफ़ल के पौधों में फ़ल आना प्रारम्भ हो गया है।

  4. थुनेर(Taxus baccata) सम्बन्धी अनुसंधान कार्य-

 अ. हैज गार्डन्स में संवर्धन कार्य- प्रभाग के अन्तर्गत विभिन्न क्षेत्रों में विगत वर्षों में थुनेर के हैज गार्डन स्थापित किये गये है। इन हैज गार्डन्स में पौधों की वृद्धि दर में तीव्रता लाने हेतु संवर्धन कार्य( प्रूनिंग आदि) कराये गये। इसके उत्साहजनक परिणाम प्राप्त हुए तथा प्रूनिंग के पश्चात पौधों की ऊँचाई, व्यास आदि की वृद्धि दर में तीव्रता पायी गयी। अभिलेखीय प्रमाण हेतु इनका मापन कार्य कर ऊँचाई, व्यास सम्बन्धित आंकड़े रखे गये हैं। प्रूनिंग करके निकाली गयी शाखाओं से कटिगें प्राप्त कर प्रवर्धन हेतु मिस्ट चैम्बर में लगायी गयी। इस प्रकार एक पौधे से 12-15 कटिंगें प्राप्त हुई।

 ब. कटिंग साइज प्रयोग- वर्तमान में प्रवर्धन हेतु 15-20 से0मी0  लम्बाई की कटिंग प्रयोग की जाती है। इनके स्थान पर छोटे आकार की(2, 4, 5, 10 से0मी0) कर रुटिंग प्रतिशत जाँच किया गया ताकि प्रवर्धन कार्य हेतु अधिक संख्या में कटिंग प्राप्त हो सके। प्रयोग में उत्साहजनक परिणाम प्राप्त हुए। इस प्रयोग को पुन: विभिन्न आकारों में दोहराया जा रहा है तथा प्राप्त परिणामों का अभिलेखीकरण किया जा रहा है।

  5. तेजपात( Cinnamomum tamala) सम्बन्धी कार्य-

 अ. बीज बोकर उच्च गुणवत्तायुक्त पौध उत्पादन- तेजपात के उन्नत वृक्षों से बीज एकत्र कर भुजियाघाट पौधशाला में 60,000 पौध तैयार की गयी। विगत दो वर्षों से इस पौधशाला में सफ़लतापूर्वक बीज बोकर तेजपात की पौध तैयार की जा रही है जो कि एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। समीपस्थ ग्रामीणों को भी इसकी पौधशाला तकनीक, पोलार्डिंग तकनीक, उत्पाद(पत्ते व छाल) प्राप्त करने व संरक्षित रखने सम्बन्धी तकनीक की जानकारी दी गयी। डिस्टिलेशन यूनिट के माध्यम से इसका तेल निकाल कर अनुसंधान कार्य किया जा रहा है।


 ब. पोलार्डिंग कार्य- तेजपात वृक्षों के उपयोगी भाग पत्तों व छाल को अधिकाधिक मात्रा में सुगमतापूर्वक प्राप्त करने हेतु अनुसंधान कार्य किया गया। इसके लिए इन वृक्षों को भूमि सतह से एक फ़ुट, दो फ़ुट, तीन फ़ुट की ऊँचाई पर काटा गया। एक फ़ुट ऊँचाई से काटे गये वृक्षों में अच्छे परिणाम प्राप्त हुए हैं।
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