1. प्रस्तावना :-
1.1 प्रदेश में वृक्षारोपण कार्य का एक पुराना इतिहास है। स्वतंत्रता
से पूर्व प्रदेश के वनों की सघनता के कारण वृक्षारोपण केवल सीमित क्षेत्रों में ही
अधिकांश तौर पर बीजरोपण तथा कुछ क्षेत्रों में पौधारोपण के माध्यम से ही किये जाते
रहे। स्वतंत्रता के पश्चात् विशेष रूप से तीसरी पंचवर्षीय योजना से वृक्षारोपण की
आवश्यकता महसूस करते हुए बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण योजनायें बनाई गई। इस प्रकार 1960
के दशक से अब तक निरन्तर पूरे प्रदेश में भिन्न-भिन्न योजनाओं के अन्तर्गत व्यापक पैमाने
पर वृक्षारोपण किये जाते रहे हैं।
1.2 उत्तराखण्ड वन विभाग जो उत्तराखण्ड राज्य के गठन से पूर्व उत्तर प्रदेश का ही अंग
था, उतना ही पुराना है जितना भारतवर्ष में वनों का वैज्ञानिक प्रबन्धन। उत्तराखण्ड
के गठन के समय वन विभाग उत्तराखण्ड द्वारा कार्य की सुगमता को दृष्टिगत रखते हुए लगभग
वे ही नीतियां स्वीकार की गई जो उत्तर प्रदेश में प्रचलित थी। अब उत्तराखण्ड को बने
हुए लगभग साढ़े चार वर्ष का समय व्यतीत हो चुका है। भारत सरकार द्वारा 1988 में राष्ट्रीय
वन नीति की घोषण की गई जो उत्तराखण्ड सहित सभी राज्यों में लागू है। राज्य में मैदानी
से लेकर हिमाच्छादित चोटियों वाले क्षेत्रों के कारण वानस्पतिक विविधता है। यहॉ के
वन उत्तराखण्ड राज्य के साथ-साथ पूरे देश के पारिस्थिकीय एवं पर्यावरण को संतुलित करते
हैं। इस आलोक में उत्तराखण्ड की वर्ष 2001 में राज्य वन नीति प्रतिपादित की गई। वृक्षारोपण
नीति को भी राज्य वन नीति के मूल उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए उत्तराखण्ड के परिपेक्ष्य
में वर्तमान में पुनरावलोकन किया जाना आवश्यक हो गया है।
2. मूल उद्देश्य :-
2.1 प्रदेश के अन्तर्गत विद्यमान वन भूमि पर वृक्षारोपण की योजनाओं
को समन्वित करना।
2.2 समस्त प्रकार की अवनत व रिक्त वन भूमि में वनस्पति में वृद्धि कर वनों के
घनत्व/ कुल वानस्पतिक निधि में वृद्धि करना।
2.3 ग्रामीणों की ईंधन की लकड़ी, चारा, लघु वन उपज एवं इमारती लकड़ी की स्थानीय
घरेलू मांग की पूर्ति हेतु उचित प्रजातियों का चयन कर रोपण करना।
2.4 प्राकृतिक वनों में वृक्षों तथा अन्य वनस्पतियों के प्राकृतिक पुनरोत्पादन
को प्रोत्साहित कर इन्हें विकसित करने हेतु विशेष उपाय करना।
2.5 वृक्षारोपण कार्य को गरीब निर्बल वर्ग के लोगों के लिए रोजगार-परक बनाते
हुए उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार लाने के उपाय करना।
2.6 उपरोक्त सिद्धान्तों की प्रतिपूर्ति के लिये वन अनुसंधान, प्रशिक्षण एवं प्रबन्धन
पर विशेष ध्यान देते हुए इनका वास्तविक परिस्थितियों एवं आवश्यकताओं के अनुरूप क्रियान्वयन
करना।