3. पृष्ठभूमि :-
3.1 वन आवरण में वृद्धि मुख्यतः दो प्रकार से की जा सकती है :
(1) वन क्षेत्र में वृद्धि
(2) विद्यमान वनों के घनत्व/समग्र वन निधि (ग्रोईग स्टाक) में वृद्धि। उत्तराखण्ड
पूर्व से ही वन बाहुल्य क्षेत्र है। प्रारम्भ में वन प्रबन्ध की नीतियों के अन्तर्गत
आवरण वृद्धि का आधार मुख्यतः प्राकृतिक पुनरोत्पादन रहा है। परन्तु तीसरी पंचवर्षीय
योजना के पश्चात् बड़े पैमाने पर कृत्रिम रोपण की योजनायें कार्यान्वित हुई हैं। विभिन्न
कार्य योजनाओं के अन्तर्गत इन दोनों विधियों से पुर्नजनन कार्य का प्राविधान किया गया
एवं तदनुसार कार्य सम्पादित किये गये। 1989 से 90 के दशक में कृत्रिम वृक्षारोपण वृहद
रूप से सामाजिक वानिकी योजना के अन्तर्गत उत्तर प्रदेश में लागू हुई। इसके अन्तर्गत
सभी प्रकार के वृक्षारोपण स्थापित किये गये। पर्वतीय भू-भाग में इसके अतिरिक्त नदी
घाटी जलागम क्षेत्रों के उपचार संबंधी परियोजनाओं में भी प्रचुर मात्रा में वृक्षारोपण
कार्य किया गया है।
3.2 उत्तराखण्ड के गठन से पूर्व विश्व बैंक पोषित वानिकी परियोजना के मूल्यांकन
के दौरान यह अनुभव किया गया कि वृक्षारोपणों को और अधिक उद्देश्य पूर्ण बनाने हेतु
इनमें गुणात्मक सुधार के लिए विशेष प्रयासों की आवश्यकता है। इस परिप्रेक्ष्य में यह
आवश्यक है कि नीति में वृक्षारोपण हेतु तकनीकी पहलुओं के साथ अनुश्रवण एवं मूल्यांकन
का भी समावेश करना आवश्यक है ताकि वृक्षारोपण की सफलता तथा उत्पादन दोनों में ही वृद्धि
हो सके।
3.3 प्रारम्भिक दशकों में वृक्षारोपण कार्य बहुत अल्प पैमाने पर किये जाते थे।
ये वृक्षारोपण अधिकांशतः अच्छी तथा सुरक्षित भूमि पर गहन देखभाल के अन्तर्गत होता था,
जिसमें इनकी गुणात्मक सफलता सुनिश्चित रहती थी। वर्तमान में अब केवल अवनत एवं अनुपयुक्त
क्षेत्र ही रोपण के लिए उपलब्ध होते हैं जिनकी स्थलीय गुणवत्ता (Site Quality) अच्छी
नहीं है। जैविक दबाव अत्यधिक है तथा अधिकतर क्षेत्र में नमी बहुत कम है। ऐसी स्थिति
में पुरानी बीजारोपण अथवा पौधारोपण की तकनीक के सापेक्ष अब नई पद्धति अपनाने पर विचार
की आवश्यकता है। यद्यपि पुनरोत्पादन हेतु कई स्थानों पर प्राकृतिक रूप से रूट स्टॉक
उपलब्ध होता है, परन्तु अधिक जैवकि दबाव के कारण पुर्नजनन नहीं हो पाता है। ऐसे क्षेत्रों
में प्रभावी एवं दीर्घकालिक सुरक्षा की आवश्यकता है।