3.4 राज्य के अन्तर्गत वर्तमान में प्राकृतिक एवं कृत्रिम पुनरोत्पादन हेतु आरक्षित
वन, सिविल सोयम वन, पंचायती वन, सामुहिक एवं निजी बंजर भूमि, सडक, नहर तथा रेलवे की
पट्टियॉ आदि प्रकार की भूमि उपलब्ध होती है। आरक्षित वनों के अवनत/ खाली क्षेत्रों
में विभिन्न कार्य योजनाओं के अन्तर्गत पुनरोत्पादन हेतु क्षेत्र इंगित रहेत हैं तथा
योजनाबद्ध तरीके से इनका उपचार किया जाता है। परन्तु सिविल सोयम वन तथा अन्य प्रकार
की भूमि पर वृक्षारोपण हेतु इनका सघन एवं दूरगामी प्रबन्ध अति आवश्यक है।
3.5 अधिकतर वन/ वृक्षारोपण क्षेत्र अत्यन्त आबादी से घिरे हुए हैं जिनमें ईंधन,
चारा एवं चराई का अत्यधिक दबाव होता है। जनसंख्या वृद्धि के साथ-साथ पशुओं की संख्या
में वृद्धि हो रही है जिसमें चराई का दबाव बढ़ रहा है। ऐसी स्थिति में कोई भी पुनरोत्पादन
कार्य की सफलता बिना आसपास की निवासियों के सहयोग लिये संभव नहीं है। अतः यह कार्य
जन आंदोलन के रूप में जन सहयोग/ सहभागिता के माध्यम से ही सम्पादित किया जा सकता है।
3.6 उत्तराखण्ड की विशिष्ट भौगोलिक एवं टोपोग्राफिकल विविधता के कारण वानस्पतिक
संरचना में भी प्रचुर विविधता है। मैदानी भू-भाग में साल, शीशम से लेकर पर्वतीय क्षेत्र
में चीड, बांज आदि के साथ उच्च स्थलीय पर्णपाती प्रजातियॉ विद्यमान हैं साथ ही बहु-उपयोगी
प्रजातियॉ विभिन्न वितानों (Storeys) में पर्याप्त मात्रा में विद्यमान हैं। इनमें
कई प्रजातियों का उपयोग स्थानीय लोगों के साथ-साथ उद्योंगों द्वारा भी किया जाता है।
अतः वृक्षारोपण की नीति में इस बहु-आयामी उपयोग को भी दृष्टिगत रखा जाना आवश्यक है।
3.7 प्रदेश वन्य जन्तु बाहुल्य क्षेत्र है एवं इनके संरक्षण में अग्रणी हे। इस
जैव विविधता को बनाये रखने में वनों का संरक्षण अत्यन्त महत्वपूर्ण है। साथ ही वन्य
पशुओं की उपयोगिता को भी दृष्टिगत रखते हुए उपयुक्त आवरण, संरक्षण/ विकास पर ध्यान
देना अत्यावश्यक है।
3.8 पुनरोत्पादन/ कृत्रिम वृक्षारोपण कार्यों को समयबद्ध तरीके से क्रियान्वित करने
हेतु राज्य/ केन्द्र सरकार की विभिन्न वित्त पोषित योजनआयें हैं। इन योजनाओं में यद्यपि
उद्देश्यों की विविधता होती है, परन्तु वृक्षारोपण क्षेत्रों की समग्र रूप से सफलता
को उच्च प्राथमिकता दी जाती है। इनके प्राविधानों में एक समन्वयन आवश्यक है। इसके लिए
विभिन्न प्रजातियों के रोपण के तकनीकी मापदण्ड, विविध कार्यों की हैं, संरक्षण/ सुरक्षा
अवधि तथा तकनीकी एकरूपता की आवश्यकता है। इन सब आयामों में नवीनतम तकनीकी, यथा पौध
तैयार करने की रूट ट्रेनर विधि, क्लोनल तकनीक, आदि को व्यापक पैमाने पर अपनाना आवश्यक
है।
3.9 राज्य का तराई, भावर क्षेत्र उत्पादन वानिकी हेतु अग्रणी रहा है। यहॉ से
ही वन्य उत्पादन, विभिन्न काष्ठ-आधारित उद्योगों के लिए महत्वपूर्ण है। इस कार्य में
तराई क्षेत्र में व्यापक पैमाने पर अनुपयोगी घासों पर नियंत्रण की विधियों में आधुनिक
परिपेक्ष्य में बदलाव लाना भी श्रेयस्कर होगा। उत्पादन वानिकी में प्रजाति चयन, प्रबन्ध
नीति परिवर्तन तथा उपयोग की दृष्टि से अधिक उत्पादन को लक्षित करना अपरिहार्य होगा।
3.10 हिमालयन क्षेत्र भू-गर्भीय व ढाल की दृष्टि से संवेदनशील होने के कारण यहॉ
पर भूमि व जल संरक्षण की दृष्टि से भी रोपण आवश्यक होगा। ऐसे कार्य छोटे-छोटे जल स्रोतों
के वानस्पतिक व अभियांत्रिक, संयुक्त उपचार से ही सफल हो सकेंगे। इनमें वृक्ष के विभिन्न
वितानों (Storeys) के साथ-साथ झाड़ियों व घासों का व्यापक उपयोग अपरिहार्य होगा।