4.6  वन वाटिका/हरित पट्टी विकासः- ऐतिहासिक, आध्यत्मिक, पौराणिक  सीलो पर वन वटिकाओं की स्थापना की जायेगी। इसके अतिरिक्त सड़कों के किनारे वृक्षारोपण एवं मार्गों में छायादार एवं शोभाकार प्रजातियों के वृक्षारोपण द्वारा इन मार्गों पर हरित पट्टी विकसित कर हरित आवरण में वृद्धि की जायेगी। 

4.7 शहरी क्षेत्रों में नगरीय वन/राष्ट्रीय/राज्य मार्ग एवं नहरों के किनारे रोपण :- 
4.7.1 नगरीय वन (City Forest):- नगर निकायों के सहयोग से शहरों के मध्य/निकट स्थित वन भूमि पर वन पंचायत का गठन कर, वन संरक्षण तथा संवर्द्धन का कार्य किया जायेगा, जिसका प्रयोग नागरिक भ्रमण क्षेत्र के रूप में कर सकें। 
4.7.2 हरित पट्टी (Green Belt):- औद्योगिक एवं नगरीय अवस्थापना के नियमों के अन्तर्गत हरित क्षेत्र तथा निकाय भूमि पर हरित क्षेत्र के विकास के लिए उपक्रमों तथा मोहल्ला समितियों का सहयोग लिया जायेगा।
4.7.3  सड़कों के किनारे वृक्षारोपणः- मैदानी क्षेत्र में पीपल, बरगद आदि पर्वतीय क्षेत्रों में सड़कों से ऊपर की ओर बांस आदि भूक्षरण रोकने वाली प्रजातियां तथा नीचे की ओर उच्च वितान के वृक्ष रोपित किये जायेंगे।

4.8  नदियों/ नालों के किनारे रोपवनः- ऐसे संवेदनशील क्षेत्रों में उपयुक्त भूक्षरण रोकने वाली प्रजातियों के पौधों के रोपण पर बल दिया जायेगा। 

4.9  आरक्षित वनों में वृक्षारोपणः- प्रस्तर 4.3 तथा  4.14 की नीति का पालन किया जायेगा। 

4.10 आरक्षित वनों से बाहर वृक्षारोपणः- प्रस्तर 4.3 की नीति का पालन किया जायेगा। 

4.11 खाल, चाल तथा तालों का विकासः- प्रत्येक वृक्षारोपण के क्षेत्र में आने वाले खाल, चाल तथा तालों को संरक्षित करना आवश्यक होगा तथा इनके आकार के अनुरूप उपलब्ध धनराशि का भाग इस कार्य के लिए आवंटित किया जायेगा।

 4.12 क्षेत्र विशिष्ट योजना (Site Specific Plan) :- सभी वृक्षारोपण योजनाओं में प्रत्येक क्षेत्र के लिए एक क्षेत्र विशिष्ट योजना (S.S.P)  का निर्माण आवश्यक होगा जो स्थान विशेष की आवश्यकताओं को देखते हुए निर्मित की जायेगी। इस योजना में क्षेत्र विशेष की मूल जानकारी (Basic Data) के अतिरिक्त उसकी समस्यायें, समाधान तथा पर्यावरण विश्लेषण पर टिप्पणी होगी। इसका अनुमोदन सक्षम स्तर से कराया जायेगा। 

4.13 वृक्षारोपण क्षेत्रों की सुरक्षाः-
4.13.1 आरक्षित वन क्षेत्रों के बाहरः-
वृक्षारोपण क्षेत्रों की सुरक्षा यथासंभव वन पंचायतों के माध्यम से सम्पन्न करायी जायेगी। इनमें सक्रिय समितियॉ नामित कर उनसे लम्बी अवधि की सुरक्षा का आपसी-करार (M.O.U) कराया जा सकता है। 
4.13.2 पौधशालाओं में आधुनिक पद्धति से पौध तैयार की जायेगी तथा समस्त वृक्षारोपण आधुनिक पौधालय तकनीक से उगाये गये उच्च गुणवत्ता युक्त पौधों से किये जायेंगे। पूर्व में क्षेत्र के विद्यमान रूट-स्टौक का अधिक उपयोग किया जायेगा। महत्वपूर्ण प्रजातियों के बीज आदि की आपूर्ति सिल्वा/अनुसंधान द्वारा की जायेगी, केवल प्रमाणिक बीज ही उपयोग में लाया जायेगा। 
4.13.3 वन पंचायत पौधशालाओं का विकासः- वन पंचायतों के अन्तर्गत ग्रामीणों के सहयोग से पौधाशालायें निर्मित की जायेंगी, जिनमें तकनीकी सहयोग वन विभाग द्वारा किया जायेगा। Top