उत्तराखण्ड में बारहमासी नदियों के अलावा कई बरसाती नाले एवं नदियां है जिनका पर्वतीय क्षेत्रों से उदगम होता है तथा ये कई स्थानों से मैदानी इलाकों में प्रविष्ट होती हैं । चूंकि ये नदियां वर्षा कालिक होती है और इनके आसपास के इलाके में भारी मात्रा में वर्षा होने के कारण बहुत सा मलबा रोड़ा, बजरी, रेता एवं पत्थर के रूप में (भारी बरसात में भूस्खलन के कारण) पर्वतों से नीचे की ओर इन बरसाती नालों एवं नदियों में बहता है।

     इस प्रकार बहकर आये पदार्थों को न हटाने से बरसात में नदी का तल कई मीटर ऊँचा हो जाता है । जब यह नदियां पर्वतीय क्षेत्र को छोड़कर मैदान में प्रविष्ट होती हैं, तो नदी के किनारों पर सामान्यतः बाढ़ की स्थिति पैदा होती है और यह बाढ़ नदी के किनारों पर स्थित वनस्पति एवं आबादी को क्षति पहुंचाती है ।

      बरसाती नदी एवं नालों के इस प्रकार मलबा जमा करने से बाढ़ जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है अतः इस मलबे को हटाना आवश्यक हो जाता है ।

    इस मलबे का औद्योगिक इस्तेमाल विभिन्न उद्योगों में होता है जैसे कि निर्माण उद्योग, कांच निर्माण उद्योग, सड़क निर्माण के लिये, जल संशोधन एवं उद्यान पथ के लिये और इनके कारण इस मलबे की अत्यधिक मांग है । मलबे का जमीन से चुगान करने के बाद विभिन्न प्रकार के रोड़े को अलग-अलग किया जाता है कई बार रोड़े में मौजूद बड़े पत्थरों को मशीन द्वारा तोड़ कर ग्राहकों की मांग की आपूर्ति की जाती है ।

      उत्तराखण्ड के वन क्षेत्रों की नदियों से उप खनिजों का विदोहन उत्तराखण्ड वन विकास निगम द्वारा भारत सरकार से वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 के तहत अनुमति प्राप्त कर चुगान द्वारा किया जाता है| वर्ष 2002-03 से विभिन्न नदियों से विदोहित उप खनिज की मात्रा तथा राजस्व निम्न निम्न प्रकार हैः-

वर्ष उप खनिज की मात्रा (लाख घन मीटर में)
रेता बजरी पत्थर
2002-03 15.38 7.97 19.55
2003-04 15.71 5.94 21.28
2004-05 16.58 10.12 27.36
2005-06 18.14 13.43 52.27
2006-07 14.83 6.41 68.48
2007-08 15.84 5.13 71.59
2008-09 14.86 3.67 74.50
2009-10 10.55 1.44 60.17

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