उत्तराखण्ड के अतिरिक्त अन्य प्रदेशों की इकाईयाँ भी भाग लेने के लिये स्वतंत्र थी।
उक्त अवधि शेष 40 प्रतिशत लीसा का निस्तारण उत्तर प्रदेश लीसा अधिनियम, 1972 के अन्तर्गत
लीसा से सम्बन्धित उत्पादों के लिए उत्तराखण्ड वन विभाग में पंजीकृत एवं वास्तव में
कार्यरत अन्य इकाईयों के बीच खुली नीलामी के आधार पर किया जाना था। नीलाम में शासन
से आवंटन की सुविधा प्राप्त करने वाली इकाईयाँ भाग लेने से प्रतिबन्धित की गयीं तथा
शेष 10 प्रतिशत लीसा का भी खुली नीलामी द्वारा किया जाना था जिसमें उत्त में विश्व
बाजारों में लीसा के मूल्यों में काफी उतार चढ़ाव आता रहा फलतः इसके असर से बहुत सी
इकाइयों ने आवंटित लीसा नहीं उठाया। अतः राजस्व की हानि होने लगी एवं इनकी सुरक्षा
का भी बोझ बढ़ता गया।
उपरोक्त के क्रम में उत्तराखण्ड राज्य के वनों से उत्पादित लीसे के निस्तारण की प्रचलित
व्यवस्था/ प्रक्रिया से सम्बन्धित समस्त पूर्व आदेशों/ निर्देशों/ निर्णयों को अतिक्रमित
करते हुए प्रमुख सचिव, वन एवं पर्यावरण अनुभाग-2
के शासनादेश संख्या-756/1(2)व.ग्रा.वि./2003-9(2)
/2001, दिनांक 30-04-2003 द्वारा लीसा नीति का निर्धारण पुनः निम्न प्रकार किया गयाः-
(1) लीसा की कुल वार्षिक फसल का 25 प्रतिशत भाग का निस्तारण अखिल भारतीय नीलामी से
किया जायेगा।
(2) 50 प्रतिशत भाग का निस्तारण उत्तराखण्ड में पजीकृत इकाईयों के बीच इकाई विशेष की
प्रसंस्करण क्षमता की सीमा तक खुली नीलामी से किया जायेगा।
(3) अवशेष 25 प्रतिशत भाग का निस्तारण उत्तराखण्ड की खादी सहकारिता कुमाऊँ मण्डल विकास
निगम तथा गढ़वाल मण्डल विकास निगम के बीच इकाई विशेष की प्रसंस्करण क्षमता की सीमा तक
खुली नीलामी से किया जायेगा।
(4) यदि ऊपर विन्दु संख्या (2) एवं विन्दु संख्या (3) के अन्तर्गत निस्तारण/ नीलामी
की कार्यवाही के पश्चात लीसे की कुछ मात्रा अवशेष रह जाती है तो उसका निस्तारण भी अखिल
भारतीय नीलाम के द्वारा किया जायेगा।
इस शासनादेश के क्रियान्वयन उपरान्त लीसे के निस्तारण मे आशातीत सफलता दृष्टिगत हुई
है, पूर्व में वर्ष 2001 तथा 2002 के अवशेष लीसे के निस्तारण सहित उत्तरोत्तर वर्षो
में उत्पादित लीसा का निस्तारण आवंटन पद्यति की अपेक्षा नीलाम से ज्यादा सफल दृष्टिगत
हुई है।