संरक्षित क्षेत्रों में जन सहभागिता :- वर्ष 1999-2000 से संरक्षित क्षेत्रों में ईको विकास कार्यक्रम प्रारम्भ किये गये थे। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य संरक्षित क्षेत्रों के आस-पास बसे गाँवों में ईको विकास समितियों का गठन कर जन सहभागिता के माध्यम से जैव विविधता का संरक्षण किया जाना है। इसके साथ-साथ वनों पर जैविक/ मानवीय दबाव कम करते हुए स्थानीय लोगों को आर्थिक सहायता प्रदान करना भी इस कार्यक्रम का मुख्य बिन्दु है। राज्य के विभिन्न संरक्षित क्षेत्रों में वर्ष 2005 तक बनायी गयी ईको विकास समितियों व उन्हें आवंटित की गयी धनराशि का विवरण निम्न प्रकार है :-
| क्रं० सं० | संरक्षित क्षेत्र का नाम | इको विकास समितियों की संख्या |
व्यय की गई धनराशी (रु0 लाख में) |
| 1 | कार्बेट राष्ट्रीय उद्यान | 29 | 100.46 |
| 2 | सोनानदी वन्य जीव विहार | 33 | 87.52 |
| 3 | बिन्सर वन्य जीव विहार | 34 | 102.20 |
| 4 | गोबिन्द वन्य जीव विहार | 34 | 137.00 |
| 5 | नन्दादेवी राष्ट्रीय पार्क | 14 | 62.65 |
| 6 | राजाजी राष्ट्रीय पार्क | 14 | 32.45 |
| 7 | केदारनाथ वन्य जीव विहार | 16 | 64.98 |
एन्टीपोचिंग यूनिट की उपलब्धियां :- राज्य के संरक्षित क्षेत्रों से बाहर के वन क्षेत्रों में वन्य जीव सुरक्षा एवं प्रबन्धन हेतु एक शिकाररोधी कार्यदल मुख्य वन्य जीव प्रतिपालक के नियन्त्रण में कार्यरत है। इस कार्यदल द्वारा शिकार, अतिक्रमण, वन उपज की अवैध निकासी, वन्य जीव व्यापार आदि के प्रकरण पकड़े गये हैं ।